चैनपुर: जहां एनडीए की नाव, महागठबंधन की ताव और बसपा की उम्मीदें दांव पर होंगी…

चैनपुर: जहां एनडीए की नाव, महागठबंधन की ताव और बसपा की उम्मीदें दांव पर होंगी…

चैनपुर विधानसभा. 206 चैनपुर. बिहार के 243 विधानसभा क्षेत्रों में से एक. जहां भाजपा ने हैट्रिक लगाई. फिलहाल सूबे के खनन व भूतत्व मंत्री ‘बृजकिशोर बिंद’ यहां से विधायक हैं. वे इससे पहले अतिपिछड़ा कल्याण मंत्री रहे. सूबे की राजनीति के लिहाज से वीआईपी सीट. सियासी गलियारों और उसके इतर इस सीट की चर्चा इसलिए भी होती है क्योंकि (बालू के वैध-अवैध खनन और ढुलाई) का मामला हमेशा सुर्खियों में रहता है, और जाहिर तौर पर उसकी चर्चा सियासी गलियारों को भी गर्म रखती है. इसी सिलसिले में डीजीपी गुप्तेश्वर पाण्डेय और सूबे के एक रिपोर्टर द्वारा उन्हें देर रात किया गए फोन और संबंधित ऑडियो ने भी खासी सुर्खियां बटोरीं.

यहां हम आपको बताते चलें कि 206 चैनपुर विधानसभा सासाराम लोकसभा का हिस्सा है/रहा है. साल 1951 में इस विधानसभा का निर्माण हुआ और तब से अब तक इस विधानसभा का नेतृत्व – कांग्रेस, भाजपा, प्रसोपा, बसपा और राजद के जन कर चुके हैं. भाजपा के मजबूत राजनेता के तौर पर चर्चित लालमुनि चौबे चैनपुर विधानसभा के चार बार प्रतिनिधि रहे. हालांकि बाद के दिनों में वे बक्सर लोकसभा के भी प्रतिनिधि रहे. 2009 के लोकसभा चुनाव में जगदानंद सिंह से हारे. अब आगे…

लालू प्रसाद और नीतीश कुमार थे साथ, फिर भी जीती भाजपा-
गौरतलब है कि बीता विधानसभा चुनाव लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के गठजोड़ का भी चुनाव था. राजद और जद (यू) के गठजोड़ के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का सियासी रंग पूरे सूबे में फीका पड़ गया था. इसके बावजूद कैमूर जिले की चारों विधानसभा सीटें भाजपा के खाते में गईं. चैनपुर में खुद बृजकिशोर बिंद, भभुआ सदर से आनंद भूषण पांडे उर्फ मंटू पांडे, रामगढ़ से अशोक कुमार सिंह और मोहनिया से निरंजन राम जीतकर सदन पहुंचे. (राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि यहां चुनाव पहले चरण में हुए. तब तक संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से “आरक्षण की समीक्षा” वाली बात ने उतना जोर नहीं पकड़ा था- बाद के चरणों में लालू प्रसाद ने आरक्षण की समीक्षा वाली बात को ही अपने चुनाव प्रचार का मुख्य आधार बनाया और परिणाम महागठबंधन के पक्ष में रहे.)

क्षेत्र में चौपाल लगाकर जनसमस्याएं सुनते विधायक सह मंत्री बृज किशोर बिंद

यहां बात गर चैनपुर विधानसभा के लिहाज से करें तो जहां भाजपा ने बृजकिशोर बिंद में तीसरी बार अपना विश्वास जताया. वहीं कभी इसी सीट से पहले बसपा और बाद के दिनों में राजद के टिकट पर सदन तक की यात्रा करने वाले महाबली सिंह जद (यू) के टिकट पर महागठबंधन के उम्मीदवार थे. महागठबंधन का उम्मीदवार होने के बावजूद महाबली सिंह आमने-सामने की लड़ाई में कहीं नहीं टिके. बृजकिशोर बिंद और जमा खां को जहां क्रमश: 58,913 और 58,242 वोट मिले. वहीं महाबली सिंह को महज 30,287 वोट ही मिले. चौथे नंबर पर 12,802 वोटों के साथ समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आलोक सिंह रहे.

बसपा का रंग रहा है चोखा-
वैसे तो बहन मायावती के नेतृत्व में चलने वाली बहुजन समाज पार्टी उत्तरप्रदेश के भीतर ही मजबूत ताकत के तौर पर देखी जाती है लेकिन उत्तरप्रदेश से सटे बिहार के इस हिस्से में बसपा जरूर एक ताकत है. बीते विधानसभा चुनाव में यहां लड़ाई भाजपा और बसपा के बीच ही रही. भाजपा के बृजकिशोर बिंद और बसपा के जमां खां के बीच जीत और हार का फासला महज 671 वोटों का रहा. इस बार भी चैनपुर में बसपा के कई दावेदार हैं लेकिन जमां खां मजबूत दिखाई पड़ते हैं. यहां हम आपको यह भी बताते चलें कि इस जिले के अधिकांश विधायक व मंत्रियों का कभी न कभी बसपा से जुड़ाव जरूर रहा है. खुद खनन व भूतत्व मंत्री बृजकिशोर बिंद भी कभी बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. साल 2009 के उपचुनाव में भाजपा के टिकट से लड़कर जीतने से पहले वे बसपा का झंडा ही ढोते थे. कभी यहां से बसपा के टिकट पर जीतने वाले और बाद के दिनों में राबड़ी देवी की सरकार में काबीना मंत्री रहने वाले महाबली सिंह भी यहां से विधायक रहे हैं. हालांकि फिलहाल वे जद (यू) के साथ हैं और काराकाट लोकसभा के प्रतिनिधि हैं.

जिले में सभी दलों की राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई है- नीली गमछी के साथ जमां खां…

इस बार कौन हो सकता है उम्मीदवार?
चूंकि चैनपुर विधानसभा के प्रतिनिधि बृजकिशोर बिंद सूबे में काबीना मंत्री हैं और यहां से हैट्रिक भी लगा चुके हैं, इसलिए चौथी बार भी उनकी उम्मीदवारी ही मजबूत है. भाजपा उन्हीं में अपना विश्वास जता रही है. वे इस बीच चुनावी लिहाज से सक्रिय भी दिख रहे हैं. महागठबंधन की ओर से राजद के भोलानाथ सिंह यादव के दावेदार होने की प्रबल संभावनाएं हैं. जिले में लंबे समय से राजनीतिक तौर पर सक्रिय भोला यादव जिला पार्षद रहे हैं और राजद के प्रधान महासचिव हैं. बसपा के लिहाज से वैसे तो कई दावेदार क्षेत्र भ्रमण कर रहे हैं जैसे पूर्व बसपा प्रत्याशी जमां खां, जिला पार्षद चंचल मिश्रा, मुन्ना पांडेय और धीरज सिंह. बसपा के लिहाज से चैनपुर विधानसभा के भीतर टिकटों की दावेदारी पर ‘द बिहार मेल’ ने प्रदेश स्तर के नेता किशोर कुणाल से बात की. किशोर कुणाल वैसे तो साफ-साफ कुछ भी बोलने से बचते रहे लेकिन उनकी बातों में भी जमां खां की दावेदारी ही अव्वल दिखी. हालांकि चैनपुर विधानसभा से नीरज पांडेय नामक एक शख्स ने भी अपनी दावेदारी प्रस्तुत की है. अभी तो वे बिना किसी बैनर के ही अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं लेकिन बदलती परिस्थितियों में बसपा के बैनर तले किसी के भी दावेदार हो जाने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. खुद नीरज पांडेय ने भी ‘द बिहार मेल’ से बातचीत में ऐसी किसी दावेदारी को सिरे से खारिज नहीं किया. बाकी आधिकारिक तौर पर टिकट बंटने में अभी जरा समय है.

चैनपुर विधानसभा के अलग-अलग गांवों में कैंपेनिंग करते हुआ भोला यादव…

विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कहां हैं मुद्दे?
जैसा कि पूरे देश-दुनिया में होता आया है, वहीं यहां भी होता दिख रहा है. मुद्दों की बातें गौण हैं. कोरोना के बढ़ रहे संक्रमण के बीच दावेदार डिजिटली और वास्तविक तौर पर सक्रिय हो गए हैं. हालांकि इस विधानसभा के अंतर्गत आने वाला एक ब्लॉक (अधौरा) डिजिटली कहीं है ही नहीं. लोग लगभग नो नेटवर्क जोन में हैं. नेटवर्क के लिए दूसरे राज्य की सीमा में जाना पड़ता है. जल-नल योजना के तमाम शोर के बीच इस इलाके के लोग पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. इस पूरे ब्लॉक में ग्रेजुएशन करने के लिए कोई कॉलेज नहीं है. हमने बीते दिनों इसके संदर्भ में रिपोर्ट्स की थीं. विधायक सह मंत्री ने नेटवर्क के लिहाज से बीएसएनएल के पांच टावर लगने की बात कही है. देखिए कब तक लगते हैं.

जल-नल योजना के तमाम शोर के बावजूद कुछ यूं है अधौरा के अधिकांश महिलाओं का संघर्ष  (तस्वीर – झड़पा)

यहां इस बात को बताना जरूरी हो जाता है कि बिहार के बंटने के बाद बिहार के कुछेक हिस्सों में ही आदिवासी जनसंख्या की अधिकता है. चैनपुर विधानसभा का अधौरा ब्लॉक उनमें से एक है. यहां सरकार पैसा तो अच्छा-खासा भेजती है लेकिन ग्रामीण अभी भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. संघर्ष आज भी “ब-स-पा” के लिए ही है. ब-स-पा बोले तो बिजली, सड़क और पानी. क्योंकि अधौरा ब्लॉक का अधिकांश हिस्सा वन क्षेत्र में आता है और वन विभाग न यहां सड़क बनने देता है और न ही बिजली के पोल गड़ने देता है. पानी का संघर्ष तो ऐसा कि गर्मी में एक ही छाड़न (जलस्त्रोत) से आदमी और जानवर पानी पीते हैं. तमाम दावेदार इस मसले को लेकर बोलते तो रहे हैं लेकिन वे कुछ कर पाएंगे ऐसा दिखता नहीं. क्योंकि साल 2009 से सरकार का हिस्सा होने के बावजूद (महागठबंधन का दौर) छोड़ दें तो अधौरा ब्लॉक वंचित ही है. बाकी के ब्लॉक समतल मैदान और सोन की नहरों की वजह से जरा बेहतर पोजिशन में हैं लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य का मामला इधर भी गड़बड़ ही है. भगवानपुर हो या फिर चैनपुर और चांद जैसे ब्लॉक. सभी ब्लॉक के सक्षम लोगों को इलाज के लिए भभुआ या बनारस ही जाना होता है. शिक्षा की बात करें तो यहां के कॉलेजों में छात्र या छात्राएं दाखिला तो लेते हैं लेकिन अधिकांश या तो मजबूरीवश या फिर इसलिए कि वे किसी अन्य शहर जैसे बनारस या पटना में जाकर कोचिंग कर सकें. यही सच है बाकी सब दिखावा…

क्या है जातीय और गैरजातीय समीकरण?
कहा जाता है कि देश-दुनिया में चुनाव जटिल विषय है. चुनाव में जीत और हार का निर्णय परिस्थितियों और समीकरणों के लिहाज से तय होता है. हिन्दी पट्टी में चुनाव का परिणाम जातीय गठबंधनों का भी चुनाव होता है. जैसे बीते बार के बिहार विधानसभा चुनाव. राजनीतिक पंडितों का मानना रहा कि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के साथ आने के बाद चुनाव के परिणाम उनके पक्ष में आने लगभग तय थे. इस बार मामला जरा जुदा है. नीतीश इस बार भाजपा के साथ हैं. बीते बार भाजपा के साथ रहने वाले उपेन्द्र कुशवाहा अब महागठबंधन का हिस्सा हैं. महागठबंधन में बिंद, मल्लाह और सहनी के आरक्षण की वकालत करने वाले और उसी मसले पर पार्टी खड़ी करने वाले मुकेश सहनी भी हैं. हालांकि महागठबंधन लोकसभा चुनाव में लगभग निल बट्टे सन्नाटा ही रहा है. फिर भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग होते हैं.

निर्दल ही लड़ने को तैयार नीरज पांडे क्षेत्र में युवाओं से बात करते हुए

चूंकि बृजकिशोर बिंद के एनडीए की ओर से दावेदार होने के बाद देखना यह भी दिलचस्प होगा कि मुकेश सहनी इस सीट पर कितना वोट महागठबंधन के पक्ष में शिफ्ट करा पाते हैं. यदि वे अंत तक महागठबंधन के साथ रहते हैं. क्योंकि राजनीति में साथ रहना और न रहना भी निश्चित नहीं. बीते विधानसभा चुनाव में ही मुकेश सहनी को अमित शाह के साथ देखा गया था. भोलानाथ सिंह यादव के महागठबंधन के दावेदार होने के बाद भी उनके सामने (राष्ट्रीय जनता दल के आधार वोट – मुसलमान और यादव) के वोटों को एकजुट रखने की चुनौतियां होंगी. ऐसा इसलिए क्योंकि बीते चुनाव में बसपा के उम्मीदवार रहे जमां खां भी मुसलमानों का ठीकठाक वोट अपने पक्ष में लेने में सफल रहे. वे भाजपा के दावेदार के साथ सीधी लड़ाई में रहे. जीत और हार का फासला हजार वोटों से भी कम रहा. हालांकि बसपा में टिकट की दावेदारी काफी हद तक चढ़ावे और सेटिंग पर निर्भर करती है. चैनपुर में भी बसपा के कई दावेदार अपनी स्कॉर्पियो दौड़ा रहे हैं. इसके अलावा नीरज पांडेय नामक एक शख्स भी ताल ठोंक रहे हैं. दल के टिकट से वैसे तो उन्हें कोई परहेज नहीं, लेकिन सबकी नजर बसपा के सीट पर ही रहती है. क्योंकि बाकी दोनों गठबंधनों में तो चीजें और दावेदार लगभग तय हैं. देखिए किसके भाग्य से ‘बसपा’ का छींका टूटता है-

तो कुछ ऐसी है चैनपुर विधानसभा (चैनपुर 206) के उम्मीदवारों, मुद्दों और समीकरणों की बात- स्टोरी व रिपोर्ट अच्छी लगी हो तो आगे बढ़ाते चलें/शेयर करते चलें. कमेंट बक्से में जरूर बताएं कि स्टोरी कैसी लगी/स्टोरी करने वाले को भी अच्छा लगता है…